शुक्रवार, 7 मई 2010

गारत पड़े इस बेमुर्रवत से दिन को
गुज़र गया जैसे कि कभी आया ही न हो

खिंची पड़ी है ये रात लकीर जैसी  हम दोनों के बीच
गुज़रे कोई इस लकीर से तो गुज़र जाए ये रात भी

कभू आया नहीं ख्याल के जगे रह गए थे हम
उम्रें बसर हो गयी इस न ढलती सी रात में

गुज़र गया जैसे कभी आया ही न हो
उस पार लेटा है लकीर के जो
बारहा अपना साया ही न हो

3 टिप्‍पणियां:

  1. जय श्री कृष्ण...आपके ब्लॉग पर आ कर बहुत अच्छा लगा...बहुत अच्छा लिखा हैं आपने.....भावपूर्ण...सार्थक

    उत्तर देंहटाएं