शनिवार, 4 मार्च 2017

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खुशबू सा देखा जाना 
ऐसे जैसे धुंध पहाड़ों की 
खिंच गयी हो 
उन दो आँखों के बीच 
और ताबीर हुआ हो एक अनकहा ख्वाब 
उसी  लम्हा 

मैंने सुना था पहली बार 
उस दरिया का शोर 
जो तुमसे होकर आया है 
मेरी जानिब तक 

शनिवार, 26 नवंबर 2016

Gussa

गुस्सा कहाँ निकालें
कमज़ोर का गुस्सा क्या होता है
कैसा होता है

क्या होता है जब एक आदमी की भूख एक करोड़ लोगों का टाइम पास बन जाती है
जब उसका शक़ कि वो भेड़ियों के बीच पैदा हुआ था
यकीन में बदल जाता है
और जब उसके अंदर का भेड़िया उलझ जाता है उसके अंदर के इंसान के साथ
और उसके अंदर का संसार
फट पड़ता है
उसके बाहर के संसार के साथ

चीख है उसकी
मगर उसको भी पता है
इसका हासिल क्या मिला है

कहाँ जाये वो लेकर
इतना सारा गुस्सा 

kashmir

ये रौशनी के साथ क्यों
धुआं उठा चिराग़  से
ये ख्वाब देखता हूँ  मैं
के  जग पड़ा हूँ ख्वाब से
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पत्थर बन जाते
उससे पहले
उठाये पत्थर
और ज़ोर से चीखे
जब बरसाईं अनगिनत सुइयां तुमने
शफ़्फ़ाक़ आसमानों से
फिर  टीवी पर उसका कार्टून चला कर
तमाशा बनाया हमारे गुस्से का

ये कैसा हिस्सा है
ये कैसा बदन है
ये क्या है उनके बीच
एक झूलते हुए टूटे हाथ सा मजबूर रिश्ता
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रविवार, 28 अगस्त 2016

ये फरेब है
के रास्ता दिखा नहीं
गलियों में पहचान वाले थे
मैं गया नहीं

काफी बुझी हुई शाम का वज़न
गीली रुई की तरह उठाते हुए
पूरी शाम एक चाय की प्याली पर फोकस कर के निकाल दी हमने
क्या फायदा हुआ
खानापूरी कर के
ये कैसा मिलना
जो खाली कर के जाता है
एक भरे हुए दिन को

Mausam -3

कई  रोज़ बिना बारिश के बीत गए हैं
बहसें गर्म हैं
टीवी में, फेसबुक पर
कश्मीर में चल रहे तनाव पर
हम लड़ रहे हैं
चौधरियों की तरह
हर कश्मीरी के वजूद पर अपने रिमोट से वोट करते हुए

हम भीड़ बनते बनते कुछ और बन गए हैं 

शनिवार, 9 जुलाई 2016

-mohabbat-1

मोहब्बत बेमुरव्वत
के तेरा क्या करेंगे 
जब अकेले हो जाएंगे 
तो यूँ सोचा करेंगे 
के 
कहा तो कई से 
पर इश्क़ खुद के अलावा 
किसी से न हुआ 
जिए कई जिल्दों में 
कई हर्फों में 
पर उनके बाहर गुज़ारा ना हुआ 

तो हम जानते हैं 
इश्क़ 
पर 
कर नहीं पाते 
सुन पाते नहीं 
याद रख नहीं पाते 

तुझे कागज़ों की ऊदास शक्लों पर 
चेपा करेंगे 
मोहब्बत  बेमुररवत 
के तेरा क्या करेंगे 

रविवार, 11 अक्तूबर 2015

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तुमसे रु बरु होता तो हूँ कई शक्लों में
वाकिफ नहीं हो पाता
नहीं देख पाता तुम्हारी दुनिया
अपनी दुनिया की मुंडेर से उचक कर

या छोड़ दूँ इस दुनिया को कुछ वक़्त के लिए
तुम्हारे वक़्त के लिए

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

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न इश्क़ किआ
न काम हुआ
न दिल्ली घूमे
न आया इंक्वालाब

न लाल किला बनाया
न गाड़े झंडे
न फ़कीर बनकर
सड़क पर भीख मांगी

बस बंद रहे
कुछ कमरों में
मकड़े की तरह
बुनते ही रहे
फंसते ही रहे 

-mohabbat 2

आँख भर आंच है
सीने भर दरिया
और मुट्ठी भर सितारे हैं

एक शराब की बोतल है
किताबें हैं
एक उम्र की कहानियां हैं

एक पूरी दुनिया है तुम्हारे हमारे बीच
और देखो तो शायद कुछ भी नहीं है

कुछ मुहब्बतों का मुक्कमल न होना
उनका हासिल है

रविवार, 15 मार्च 2015

ख्वाबगाह कोई नहीं
मैं हूँ  कुछ वक़्त भी ले आया हूँ
कोई कल नहीं न बीता न आनेवाला
आज का लम्बा सफर ले आया हूँ