बुधवार, 12 सितंबर 2018

galte logon ke beech

कई बार गलत साबित होना ज़रूरी था
हौसले का टूटना
वज़ूद का टूटना
ख़त्म होना ज़रूरी था

कुछ नहीं
बनने के लिए

कुछ भी बनने के लिए
कुछ नहीं बनना ज़रूरी था 

बुधवार, 27 जून 2018

der raat- subah ki taiyaari mein

तल्ख़ इमरोज़
और हर दिन वही
हारा मैदान
थकन और नींद के बीच
सुकू की मौज़ के थपेड़ों में
मेरे साथ
बहो जाना

ये रवानगी
ये दरिया बहते लम्हों का
ये शोर जो डूब रहा है सूरज के साथ
तुम कहाँ हो जाना के मैंने रोक रक्खी है
वो एक मौज जो आ कर रुकी है साहिल पर
एक उम्र की तल्खियत का नन्हा हासिल

इस शाम
साथ रहो
नींद के आ जाने तक 

गुरुवार, 10 मई 2018

Varis

दश्त का
वारिस हूँ मैं
मेरा काम
याद रखना है
उस लम्हे से जब
ये तय हो चला था
कि  हर शहर उजाड़ होगा
बसेगा एक जैसे लोगों का
एक जैसा शहर
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कुछ वो जुड़े
जिन्हे ख़ुशी थी
किसी और के घर के जलने की
और कि
उन्होंने नहीं किया ये घिनौना काम
बस करवाया

फिर उनके घर की बारी आयी
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आग से मिन्नतें नहीं करते
न वजह देते हैं
आग जब फैलती है
तो लकीरें कहाँ देखती है
ये तुमने खींची ये उसने खींची
तो
वो
मत
जलाओ
जो
बुझा

सको
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हद के आगे दश्त है
वक़्त के आगे दश्त है
हर बियाबान का माज़ी एक बस्ती थी
हर बस्ती का चेहरा एक दश्त है
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मैं याद रखूँगा
ये वक़्त
जब किसी ने
खींची थी छत
और भर दिया था झुलसता आसमान
घर में मेरे
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मैं वारिस हूँ
मेरा काम याद रखना है

मंगलवार, 8 मई 2018

हम गुलशन में लाशों की फसल देख रहे हैं 
जो उग रही है 
हमारी आखों में 
मोतियाबिंद की तरह 

गुज़र जायेगा ये वक़्त 
नफरतों की दो सुईओं पर नाचता 
और हम खड़े होंगे 
ये सोचते हुए 

के हुआ क्या 



मंगलवार, 26 सितंबर 2017

muhabbat-6

कितनी एक तरफ़ा मुहब्बतों की
कब्रगाह हूँ मैं
और ऐसी कितनी कब्रगाहों में हूँ मैं दफ़न

काश एक शाल में लिपटे होते
अपनी आरज़ूओं के हाथ थामे
एक सब्ज़ दरख़्त के नीचे
ओढ़ कर पश्मीने का कफ़न

इश्क़ में तड़पा करो तुम सारी जनम
मेरे अश्कों की प्यास लेकर अपने होठों पर
मेरे आवारा मुहब्बतों में गिरफ्तार रकीब
मेरी दुआ लो
जाओ ऐश करो 

khat

ये वो जगह है
जहाँ से
चुप्पी और चुप्पी
के बीच
बहती हुई एक नदी है

आवाज़ के बाहर
अलफ़ाज़ के बाहर
सांस और छुअन की यातनाएं हैं
देखना और देखा जाना है
चलना है बगल -बगल
खाना है
खुशबू है
और अनगिनत
भाषाएं रची बसी हैं

कर दो दस्तखत
इस चुप्पी की वादी में
निगाहों से
चुप चाप
सरका दो एक लिफाफा मेरी तरफ

तुम वो लिख दो जो तुम लिखना चाहो
मैं वो पढ़ लू जो मैं पढ़ना चाहूँ



शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

muhabbat -5

एक बेचैन सी चुप्पी के दोनों तरफ
हमारी अपनी अपनी कयनातें हैं
तुम्हारे पास हैं सैलाब सवालों के कई
मेरे पास गए दिन की वारदातें हैं

ज़ाया किये गए कई महफिलों के प्याले हैं
अनपढ़ी चिट्ठियां है ख्यालों के पुलिंदों में दफ़न
दिल एक टूटे light house सा जज़्बातों के समंदर पर
ओढ़ कर बैठा है हज़ार सन्नाटों का कफ़न

आओ शराब पिएं आहटों के साये में
हर इंसान एक मुक्कमिल होता ख्वाब नहीं
वो हकीकत है ज़मीन है आइना है
एक बेचैन सी चुप्पी का जवाब नहीं


सोमवार, 4 सितंबर 2017

Dilli-1

इस शहर में अफसानों का धुआं
अब भी है
इमारतों के बीच फंसा आसमां
अब भी है 

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

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हर नयी रात का
कायदा है
कुछ भूल जाना

फिर मिलना अगली सुबह से
याददाश्त के उसी चौखट पर
जहाँ न जाने की
हज़ार मिन्नतें की थी

ख़राब होता है वक़्त के साथ
आदमी पुर्ज़ा है
जंग खाता है
याददाश्त की चट्टानों से रोज़ घिसकर
टूट जाता है

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

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रोज़ लड़ता हूँ
रोज़ थकता हूँ
रोज़ अपने गुस्से से कहता हूँ
बस
कुछ और रोज़
इसके बाद एक नयी सुबह
एक मुक्कमल आज़ाद फलक
और रोज़
मेरा गुस्सा
कहता है
देख
इस झूठ के बाहर
का सच