शनिवार, 30 जुलाई 2011

कहूँ कुछ भी 
अलिफ़ तुम ही होते हो
तुमसे जुदा बातें नहीं होती मेरी 

न आते भी ज़िक्र तुम्हारा चला आता है 

मुहब्बत हो या नफरत 
मिजाज़ बदमस्त रहता है 
वो लादादात बहते अश्कों में
हमारी कश्ती का सफ़र जारी है

गुम गया है कोई पते में 
और उतनी दूर के बुला भी न सकें 
छू के भाग जाते हैं उसकी आवाज़ के साए 

न बुलाना चाहता हूँ पास
न दूर जा के बैठूंगा 
खिडकियों में बंद हो कर देखूँगा 
तुम्हारे चेहरे के बदलते मौसम 

हयात ए इंतज़ार 
बड़ा मीठा सा ज़हर है जानम
हम इसको पिए जाते हैं 
ये हमको पिए जाता है  


बुधवार, 27 जुलाई 2011

for joseph macwan

तुम्हारी मुट्ठी में कैद हैं सांसे मेरी
तुम्हारे पंजे जबड़ों की माफिक

मेरा वजूद दबोचे बैठे हैं

घुटन पुश्तों से घुल गयी है
पत्थर पे रिसते खून में

पूछते हो क्यों बम बन गया मैं

रविवार, 24 जुलाई 2011

tanhai

रात इस बार बेकार लौट आई है

उन सभी आवाजों से भागकर
पनाहगीर हांफती
पहुच नहीं पाती है अपने घर
बस छटपटाती रहती है मेरे बिस्तर पर
न खुद सोती है न मुझको सोने देती है

चाँद झांकता रहता है खिड़की से मेरे
घूरता रहता है रात का धुंधला चेहरा

बस हम तीनो और पंखे की नाचती परछाई है
एक hyphen है तन्हाई और तन्हाई के बीच

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

antaraal

सुलझ जाता हूँ तो लिख नहीं पाता
लिखना खुद से कहना हो गया है
चुप होता हूँ तो कह नहीं पाता

कवि नहीं हूँ
पेचीदगी से जूझने के लिए लिखता हूँ
लिख लिख कर खुद को खाली करता हूँ
खाली होता हूँ तो लिख नहीं पाता

देख रहा हूँ 
उलझ रहा हूँ फिर 

कुछ  तो इसका भी बन जायेगा हमारे साथ