शनिवार, 28 जनवरी 2012

ChanduKhane-1

(चंडूखाने नशाखोरी की जगह होती थी जहाँ अलग अलग नालियां एक हुक्के में लगी होती थी , लोग हुक्का पीते और गपियाते थे )

 तत्सुमी उवाच :
इमान से कहता हूँ मैं 
इस चंडूखाने में भी 
चढ़ती नहीं आजकल 

धुआं खेलते ही उड़ते हैं अलफ़ाज़ सबके एक साथ 
जैसे कागज़ के जहाज़ 
जिनका मालिकाना हक अब सिर्फ हवा का है 
लुक्का उवाच:
चढ़ने और न चढ़ने का फर्क 
यहाँ से बाहर निकलने से डरने का फर्क 
कहने और न कहने का फर्क 
एक पहर के लिए खुदावालों की नज़रों से दूर 
दिल के करीब होने का 
अपने सीने से उसे खींच कर बहार निकलने का 
और उसकी आँखों में आँखें डाल कर 
बातें करने का फर्क 
दिख जाता है मियां 
शायद चढ़ती है तो बड़े प्यार से 
उतरती है तो उतार लेती है दो कदम ज़मीन की ओर

नज़रों पर पट्टी हमने भी बांध ली है कौरवों के अब्बा की तरह 
हमें ज़रुरत नहीं है किसी संजय की 
खुदी के सारे तमाशे खुदी को रास रहे 

तत्सुमी उवाच:
मुबारक हमको अपना चंडूखाना है 
यही दोज़ख यही ज़न्नत यही ज़माना है 
ज़िक्र चलता रहे मतलब - बेमतलब किसी शेह का 
किस गधे को इस महफ़िल से उठ के जाना है




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