मंगलवार, 20 दिसम्बर 2011

kavi ko kahiye

कवि को कहिये
चुप रहे
कविता कहने और सुनने की नौटंकी
कहीं और करे
ये मनोरंजन के शगल क्रांति के धोखे से
उन किसानों के घर घुस आये हैं
पिछले पूस जला दिए गए झोपड़े जिनके
जिन्हें थप्पड़ों लातों से मिलती रही पगार
जिनकी जात जिनका नाम
एक गाली है

कवि को कहिये
इस धोखे में ना रहे
कि वो कुछ बदल रहा है
अपने भांडों कि जमात के साथ
वो भी
आत्म प्रवंचना की सड़क पर चल रहा है

कवि को कहिये
बस सुने
पत्थर में सनी पुश्तों का शोर
उनके फेफड़ों की धौंकनी से बहती
गर्म हवा की सीटी
उनके पेटों में गलते कुदाल और हल
जहाँ से अब
बंदूकें बनेंगी

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