रविवार, 24 जुलाई 2011

tanhai

रात इस बार बेकार लौट आई है

उन सभी आवाजों से भागकर
पनाहगीर हांफती
पहुच नहीं पाती है अपने घर
बस छटपटाती रहती है मेरे बिस्तर पर
न खुद सोती है न मुझको सोने देती है

चाँद झांकता रहता है खिड़की से मेरे
घूरता रहता है रात का धुंधला चेहरा

बस हम तीनो और पंखे की नाचती परछाई है
एक hyphen है तन्हाई और तन्हाई के बीच

1 टिप्पणी:

  1. Are itna tanhai me mat raho...kabhi mahfilo ke bhi maje lo.....
    Very nice:::::::
    jai hind jai bharatAre itna tanhai me mat raho...kabhi mahfilo ke bhi maje lo.....
    Very nice:::::::
    jai hind jai bharat

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