गुरुवार, 19 सितंबर 2013

Albert camus ke liye-2

जितनी भी लड़ी
किसी और की लड़ाइयाँ लड़ी

अपनी ज़मीन का कभी पता नहीं माँगा
अपनी वजह की कोई सूरत नहीं देखी

बेवजह हूँ आज
और सोचता हूँ
आगे कैसे चलूँ
कब तक बैठूं
नदी के किनारे पर

किसकी लडूं लड़ाइयाँ
खुद की बना के मैं
अनगिनत रिमोट कण्ट्रोलों के अंत में एक यांत्रिक वध
किसका करूँ

किसको मारूं किससे मरुँ
या बेवजह जियूं 

3 टिप्‍पणियां:

  1. कहीं एक अलग दुनिया होती
    बेवजह लड़ने वाले सिपाहियों की
    जहाँ वक्त-बेवक्त
    लड़ने से break लिया जा सकता

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