मंगलवार, 1 मार्च 2011

mera shahar

मेरा शहर मुमकिन नहीं 
हर रोज़ बनाता हूँ अपने सच की रेत से 
मासूम रोज़ ही आ जाता है लहरों के थपेड़ों में 

अपने मुमकिन से शहर में मुहाफ़िज़ रख लो 
दुनिया में ऐसे भी सपनों की हकीकत नहीं होती 

1 टिप्पणी:

  1. अपने मुमकिन से शहर में मुहाफ़िज़ रख लो
    दुनिया में ऐसे भी सपनों की हकीकत नहीं होती

    bahut hee khoobsurat rachna

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