सोमवार, 18 जून 2012

ped

हाथ अपने भींच कर
खुद का गट्ठर बना कर
सर झुका कर
वध्य
ठिठुरता बारिश की ठंड  में

कीचड सा मैं
सड़क के किनारे
घर जाने से डरता हूँ

धंस जाना चाहता हूँ
मिटटी में
और गड़ा रहना चाहता हूँ
पेड़ की तरह
अपनी जडें फैलाते - समेटते

भीगता सूखता गलता सड़ता
अपनी जगह पर स्थिर
इंतज़ार में
कि कोई आये
कुल्हाड़ी से मेरे सौ टुकड़े कर डाले
फिर सुखा डाले नमी की हर बूँद
धुआं बन सुलगा करे हर टुकड़ा मेरा फिर
ठंड से लड़ते हुए ......



2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर -"धुआं बन सुलगा करे हर टुकड़ा मेरा, फिर ठंड से लड़ते हुए..."
    पढ़ कर अच्छा तो लगा और दिमाग का फलूदा भी किया | सोचती हूँ की किसी कुल्हाड़ी के लिए इंतज़ार पेड़ की मजबूरी है या उसकी उम्मीद | टहनियों का काटना हो या ज़मीन से खिलवाड़ नतीजा नमी की कमी और पेड़ का सहमापन. बहुत बढ़िया लिखा है आनंद|

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  2. आह ! ऐसी कल्पना या ह्रदय की चाहत..

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