गुस्सा कहाँ निकालें
कमज़ोर का गुस्सा क्या होता है
कैसा होता है
क्या होता है जब एक आदमी की भूख एक करोड़ लोगों का टाइम पास बन जाती है
जब उसका शक़ कि वो भेड़ियों के बीच पैदा हुआ था
यकीन में बदल जाता है
और जब उसके अंदर का भेड़िया उलझ जाता है उसके अंदर के इंसान के साथ
और उसके अंदर का संसार
फट पड़ता है
उसके बाहर के संसार के साथ
चीख है उसकी
मगर उसको भी पता है
इसका हासिल क्या मिला है
ये रौशनी के साथ क्यों
धुआं उठा चिराग़ से
ये ख्वाब देखता हूँ मैं
के जग पड़ा हूँ ख्वाब से
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पत्थर बन जाते
उससे पहले
उठाये पत्थर
और ज़ोर से चीखे
जब बरसाईं अनगिनत सुइयां तुमने
शफ़्फ़ाक़ आसमानों से
फिर टीवी पर उसका कार्टून चला कर
तमाशा बनाया हमारे गुस्से का
ये कैसा हिस्सा है
ये कैसा बदन है
ये क्या है उनके बीच
एक झूलते हुए टूटे हाथ सा मजबूर रिश्ता
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रविवार, 28 अगस्त 2016
ये फरेब है
के रास्ता दिखा नहीं
गलियों में पहचान वाले थे
मैं गया नहीं
काफी बुझी हुई शाम का वज़न
गीली रुई की तरह उठाते हुए
पूरी शाम एक चाय की प्याली पर फोकस कर के निकाल दी हमने
क्या फायदा हुआ
खानापूरी कर के
ये कैसा मिलना
जो खाली कर के जाता है
एक भरे हुए दिन को
कई रोज़ बिना बारिश के बीत गए हैं
बहसें गर्म हैं
टीवी में, फेसबुक पर
कश्मीर में चल रहे तनाव पर
हम लड़ रहे हैं
चौधरियों की तरह
हर कश्मीरी के वजूद पर अपने रिमोट से वोट करते हुए