गुरुवार, 14 नवंबर 2013

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कितने कसबे छूटे हमसे 
एक तेरा ही क़स्बा साथ रहा 
कितने चेहरे छूटे हमसे 
एक तेरा ही चेहरा साथ रहा 

कई सूखे ज़र्द दरख्तों पर 
तिनकों के मोहल्ले बनते रहे 
सारे सपने छूटे हमसे 
एक तेरा ही सपना साथ रहा 

उम्र का क्या है, क्यों रोकें 
जो ढलती हो सो ढल जाये 
जो कुछ भी था, वो छूट गया 
जो कुछ भी था वो साथ रहा 

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

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एक फलक 
काफी है 
जिन्दगी भर की शर्मिंदगी के लिए 
कितने फलक टांगे तूने 
अपने पास बुलाने को  

मैं बस सर उठा कर देख सकता हूँ 
जो उड़ता तो क्या उड़ता 

कितने सवेरे लिख डाले तेरे नाम 
सारे बेरंग लौट आये हैं 
फीके कसैले सवेरे 
बेहूदे बरसातिये 

बंद दरवाज़ों से जवाबों में सुराख़ कर कर के 
और दरवाज़े ही देखे मैंने 
अपनी शामों के चाक सीनों पर 
सपनों की कितनी मोमबत्तियां गलाई थी 

अपने नीमबाज़ सपने में 
तुझसे जाने क्या क्या न मांग बैठा मैं 

शर्म और बदरंग मौसम के बीच मैं 
तुमसे हुआ एक हादसा हूँ 
और तुम्हें सनद भी नहीं 
के तुमने आसमान टांगा था 

जिंदगी बड़े  दिल तोड़े हैं तुमने
 
ये मेरा भी है 
हाज़िर है 
आगे के लिए क्या बांधूं  मैं
डर के इस गट्ठर के सिवा

डर की छांव में पला बढ़ा
उससे बाहर कैसे निकलूं  मैं

कैसे उड़ जाऊं पंखों बिन




Albert camus ke liye-2

जितनी भी लड़ी
किसी और की लड़ाइयाँ लड़ी

अपनी ज़मीन का कभी पता नहीं माँगा
अपनी वजह की कोई सूरत नहीं देखी

बेवजह हूँ आज
और सोचता हूँ
आगे कैसे चलूँ
कब तक बैठूं
नदी के किनारे पर

किसकी लडूं लड़ाइयाँ
खुद की बना के मैं
अनगिनत रिमोट कण्ट्रोलों के अंत में एक यांत्रिक वध
किसका करूँ

किसको मारूं किससे मरुँ
या बेवजह जियूं 

रविवार, 1 सितंबर 2013

sawaal

कितनी दूर खड़े है 
रास्तों के पत्थर 
पैगम्बर नुमा 
एक के बाद दूसरा पत्थर 
और एक जलती सड़क 

इतने सालों की कमाई 
सिर्फ थकन 
और डर 
हर उस रास्ते से 
जो सीधा नहीं जाता 

इन रोज़मर्रा की आदतों के परे 
उसके बदलने के डर से परे 
मैं कौन हूँ 


रविवार, 11 अगस्त 2013

imaraton ke bare mein

मलबा ही आखिरी पड़ाव है
हर ईमारत का
फिर भी कितनी इमारतें खडी करता है
हर बार आदमी

और हर बार
बनाने का रोमांस
गिराता है एक बने ईमारत की नीव

सत्य किसी भी ईमारत का
उसके होने में नहीं
उसके बनने और बिगड़ने में है
उस dialectic में है
जो देख रही है
ऐसी कई अनगिन इमारतों को
बनते बिगड़ते हुए 

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

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ठंढ को महसूस करना एक कला है
हर रोये से चूमना हवा की नमी को
कानों से झन्ना के चटक जाये
किसी कोहरे का सितार
सूरज को मानो एक tungsten filter से देखना
और फिर आहिस्ता आहिस्ता उसे बैठते देखना बगलवाली कुर्सी पर 
सुबह की चाय के वक़्त

और कभी स्टेट ट्रांसपोर्ट के बस के पीछे भागते हुए
महसूस करना
चेहरे पर जमता ठंडा पसीना
ठंढ में प्यार करना
गुनगुनाना
घर थोड़ी देर से आना
और रखना अरमान
एक अदद ओवरकोट का
ठंढ में रुई के अनगिनत गोलों के बीच
बूढा हो जाना
सफ़ेद

ठंढ का इंतज़ार करना एक कला है 

बुधवार, 19 जून 2013

sangam

अबाध
बहता गया
कहीं तो नदी का  अंत
पूछेगा मुझसे
किस किनारे
पर मिलेगा रे
समुन्दर
कितनी दूर आया मैं
तेरा पता लेकर
कितने गाँव कितने शहर
कितने रिश्ते नाते
....बस इसलिए के तेरे साथ बैठूं एक दिन

तू कौन है
मैं कौन हूँ
और क्या है ये अनगिनत वर्षों का संघर्ष
बस एक क्षणिक विलय के सुख का

मंगलवार, 18 जून 2013

tazurbe

कगारों पर जो लिख गए
लहरों के थपेड़े
उनसे समंदर का चेहरा
दीखता तो होगा

कितने जहाज़ आये
कितने मजाज़ आये
किनारा है अगर ठहरा
कोई तो आता होगा

या तो बहना है
या ठहरना है
के जीने के तरीकों में
शायद कभी गलती से
कोई तीसरा तो होगा 

बुधवार, 22 मई 2013

baarish

बारिश की बूंदों में घोल कर पी है
शराब में थोड़ी नमी थोड़ी हवा भी घुली है
घुला है आसमान , घुली है मौसम की बेपर्वाहियाँ
थपेड़ों के मौज पर उड़ते हुए बादलों का जोर

अब तक ज़ाया की कितनी शराब
आंसुओं में घोलकर