रविवार, 24 जुलाई 2011

tanhai

रात इस बार बेकार लौट आई है

उन सभी आवाजों से भागकर
पनाहगीर हांफती
पहुच नहीं पाती है अपने घर
बस छटपटाती रहती है मेरे बिस्तर पर
न खुद सोती है न मुझको सोने देती है

चाँद झांकता रहता है खिड़की से मेरे
घूरता रहता है रात का धुंधला चेहरा

बस हम तीनो और पंखे की नाचती परछाई है
एक hyphen है तन्हाई और तन्हाई के बीच

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

antaraal

सुलझ जाता हूँ तो लिख नहीं पाता
लिखना खुद से कहना हो गया है
चुप होता हूँ तो कह नहीं पाता

कवि नहीं हूँ
पेचीदगी से जूझने के लिए लिखता हूँ
लिख लिख कर खुद को खाली करता हूँ
खाली होता हूँ तो लिख नहीं पाता

देख रहा हूँ 
उलझ रहा हूँ फिर 

कुछ  तो इसका भी बन जायेगा हमारे साथ


सोमवार, 20 जून 2011

क्यों रास्तों में परदे नहीं टंगे कुहासों के
लोगों की नज़रें दोपहर सी लगती हैं 

मुझे छुपा लो तुम्हारी बेपनाह गलियों में 
मुझे दिखना नहीं है लोगों में 


itivrit5

कुछ नहीं है लिखने को
बेआवाज़ अल्फाजों की पतंगें हैं
छत पे बैठा 
उडाता रहता हूँ हवाओं में 

मेरा नाता नहीं है इनसे अब
ये हवाओं के जने उनके सगे 
इनको किसी दूर देस जाना है 

इनका नाता नहीं है मुझसे अब
मेरे घर में नए अलफ़ाज़ लिए
नए मानी आ गए हैं किराये पे 
पतंगों की तरह दूर कहीं उड़ने को 

रविवार, 12 जून 2011

for manali

दरिया के सिरहाने
लेटे हैं पहाड़
शाम के साए सुलगती सी लौ के एक तरफ

मैं कदम दो कदम सरकता हूँ
उनकी गोद में गुम है घर मेरा
जिसके चेहरे पे एक लालटेन टांगी थी

उस घर में कई लिहाफ पड़े रक्खे हैं
उनमें घुसकर किसी के सिरहाने में
मुझे सुननी है कहानियां हसीन परियों की

मुझे उठकर सुबह अपने मुह से
धुएं के छल्ले फेंकने हैं कुहासों की तरफ
फिर फिसलकर कई इत्मीनान गलियों से
किसी टपरी चाय maggi खाना है......

नहीं लगता है मन तेरे  शहर में अब
मुझे ले चल कहीं पहाड़ों में

गुरुवार, 2 जून 2011

किनारे से अब न कहो दूर कहीं जाने को
बहुत तैरा हूँ मैं बदमिजाज़ लहरों में

कब से देखा किया अपनी ही शकल में उसको
सांस ले ले के याद की उसकी सांसें
पागलपन की हद तक रगडा आब पत्थरों के सीने में

इनकार है मुझको और जूझने से अभी
इनकार है मुझको और जूझने में अभी  


गुरुवार, 12 मई 2011

from kabir vani- haman hai ishq mastana

Haman hai ishq mastana, 
Haman ko hoshiyari kya?
Rahe azad ya jag mein,
Haman duniya se yaari kya?


Jo bichude hain piyare se,
Bhatakte dar badar phirte,
Hamara yaar hai humme,
Haman ko intazaari kya?

Na pal bichude piya hum se,
Na hum bichude piyare se
Unhi se neh laga hai,
Haman ko bekarari kya?

Kabira ishq ka mata,
Dui ko dur kar dil se.
Jo chalna rah nazuk hai,
Haman sar bojh bhari kya?

बुधवार, 4 मई 2011

album

खो गए घर 
फोटुओं में 
बस खराशें रह गयीं 

ईट पत्थर 
रह गए 
रिश्तों की फासें रह गयीं 

अब बना भी लोगे 
तो खाली ही बनता जायेगा 
अँधेरे में घूरता हुआ 
सवाली ही बनता जायेगा 

बंद कर के रख दो
धुएं के पिटारे को 
खुल गया तो
ये दिन बिचारा गुज़र न पायेगा 

सोमवार, 2 मई 2011

skeptic

चिरागों से जल जाता है
आज कल घोसला मेरा

कलमा पढ़ कर ही मुस्कुराता हूँ

खुशियों का क्या ठिकाना
किस डाल जा फिरें

ज्यादा खुश होता हूँ तो डर जाता हूँ

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

itivrit4

चलते रहना है बे मकाँ होना  
ठौर पल का है 

वक़्त की फिसलन पर
पंचर पड़ी रातों में घुसकर
उन्मुक्त बहेगा मेरी वीणा का स्वर 

मिल जाना है लापता होना
चलते रहना है बे मकाँ होना 
 
मैं स्वयंभू 
निर्वात में मसनद लगा कर 
हांकता हूँ 
अपने बे लगाम घोड़ों को

इस रात फलक के दरवाजे पर 
नींद ओढ़ कर 
बेहिसाब सपने देखूंगा