गुरुवार, 2 जून 2011

किनारे से अब न कहो दूर कहीं जाने को
बहुत तैरा हूँ मैं बदमिजाज़ लहरों में

कब से देखा किया अपनी ही शकल में उसको
सांस ले ले के याद की उसकी सांसें
पागलपन की हद तक रगडा आब पत्थरों के सीने में

इनकार है मुझको और जूझने से अभी
इनकार है मुझको और जूझने में अभी  


गुरुवार, 12 मई 2011

from kabir vani- haman hai ishq mastana

Haman hai ishq mastana, 
Haman ko hoshiyari kya?
Rahe azad ya jag mein,
Haman duniya se yaari kya?


Jo bichude hain piyare se,
Bhatakte dar badar phirte,
Hamara yaar hai humme,
Haman ko intazaari kya?

Na pal bichude piya hum se,
Na hum bichude piyare se
Unhi se neh laga hai,
Haman ko bekarari kya?

Kabira ishq ka mata,
Dui ko dur kar dil se.
Jo chalna rah nazuk hai,
Haman sar bojh bhari kya?

बुधवार, 4 मई 2011

album

खो गए घर 
फोटुओं में 
बस खराशें रह गयीं 

ईट पत्थर 
रह गए 
रिश्तों की फासें रह गयीं 

अब बना भी लोगे 
तो खाली ही बनता जायेगा 
अँधेरे में घूरता हुआ 
सवाली ही बनता जायेगा 

बंद कर के रख दो
धुएं के पिटारे को 
खुल गया तो
ये दिन बिचारा गुज़र न पायेगा 

सोमवार, 2 मई 2011

skeptic

चिरागों से जल जाता है
आज कल घोसला मेरा

कलमा पढ़ कर ही मुस्कुराता हूँ

खुशियों का क्या ठिकाना
किस डाल जा फिरें

ज्यादा खुश होता हूँ तो डर जाता हूँ

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

itivrit4

चलते रहना है बे मकाँ होना  
ठौर पल का है 

वक़्त की फिसलन पर
पंचर पड़ी रातों में घुसकर
उन्मुक्त बहेगा मेरी वीणा का स्वर 

मिल जाना है लापता होना
चलते रहना है बे मकाँ होना 
 
मैं स्वयंभू 
निर्वात में मसनद लगा कर 
हांकता हूँ 
अपने बे लगाम घोड़ों को

इस रात फलक के दरवाजे पर 
नींद ओढ़ कर 
बेहिसाब सपने देखूंगा 





बुधवार, 16 मार्च 2011

love 1

उनको चुप्पी से सुना करता था
उनकी क़दमों की आहट में
रास्तों के चेहरे बुना करता था

उनकी आवाज़ बरसी है आज घर पे मेरे
गीला गीला सा हूँ मुस्कुराता रहता हूँ 

सोमवार, 7 मार्च 2011

itivrit 3

मैं बहना चाहता हूँ 
मगर दरिया नहीं हूँ 
पत्थर हूँ 
एक बरसाती नदी की राह में बैठा 
इंतज़ार कर रहा हूँ सावन के बरसने का 

ऐसे कई मौसम 
जब गुज़र जायेंगे तब 
शायद पहुच जाऊंगा तुम्हारे शहर तक 
मुझे उठा कर तराशना मत 
मैंने नदी के साथ बहकर 
वक़्त के साथ एक शक्ल पाई है
ये चेहरा नहीं है इतिहास है मेरा, मेरा इतिवृत 
बस पड़े रहने देना नदी के किनारे
ताकि उन आखिरी दिनों में थोडा सुस्ता सकूं मैं

खैर ये काफी देर की बातें हैं 
अभी देखें कितने घुमड़ कर आते हैं बादल 
अगले महीने में 

बुधवार, 2 मार्च 2011

debates

अपनी तबियत के मारे 
मन के बच्चे 
अपनी ज़बान के खारिज होने के 
गूंगेपन से जूझते 

रोज़ उस पुल पे आ बैठते हैं
पुल का दावा है कि वो एक दिन जोड़ेगा 
जिंदगी के दो सिरे .....

उम्मीद की लाश पर तने
इस लोहे के मकबरे से पूछो 
कितनी पुश्तें गुमराह की हैं इसने 
झूठे वादों से 


मंगलवार, 1 मार्च 2011

mera shahar

मेरा शहर मुमकिन नहीं 
हर रोज़ बनाता हूँ अपने सच की रेत से 
मासूम रोज़ ही आ जाता है लहरों के थपेड़ों में 

अपने मुमकिन से शहर में मुहाफ़िज़ रख लो 
दुनिया में ऐसे भी सपनों की हकीकत नहीं होती 

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

सिलसिलेवार तरीके से घट रही थी
हमारे आस पास 
हम उसे जिंदगी बुलाते रहे
बच्चे स्कूल जाने से डरने लगे 
अखबार टोइलेट की तरह साफ़ 
पड़ोस से अचानक लोग गायब होने लगे 

जो आता रहा टीवी पे 
बेचता रहा डर
अलग अलग शक्लों में 
हर चीज़ के लिए मशक्कत 
जीना मुश्किल हुआ
फिर बेमतलब 

फिर आदतों का एक मुल्क बनता गया 
बेमतलब बेतरकीब बेहिसाब बढ़ता हुआ
एक घाव 
जिसकी टीस की लत में धुत
एक पूरा देश नीद से जगाने वालो की माँ बहन करता हुआ
सोता रहा 


coma में लेटे 
अपने मुल्क की उनींदी पलकों से 
मक्खियाँ भगाते हुए
सिलसिलेवार तरीके से
तीस साल का हो गया